भारत – उत्तर बंगालमे चाय बागान फिरसे खुल गया – फिरभी मजदुर असंतुष्ट क्युं ?

चिंचुला चाय बागान भारतके उत्तरी पूर्वमे उत्तर बंगालके डुअर्स क्षेत्रमे स्थित है । चाय बागानोंपर आयी आपत्तीके समय मालिकने पहले नवंबर 2003 मे यह चाय बागान बंद किया और जून 2004 मे इसे फिरसे खोला गया । नवंबर 2005 मे यह बागान फिरसे अनिश्चित समयके लिए बंद किया गया ।

चाय बागानपर आयी विपदाके बहुतही बुरे दौरमें चाय बागानोंके मालिकोंद्वारा उठाये गये कदमोमे यह बात आम थी । कोईभी चाय बागान मंदीके मौसममे (नवंबर से मई) बंद किया जाता था, और तेजीके मौसममे (जूनसे अक्तुबर) फिरसे खोला जाता था । यह तरीका अपनाया गया क्युं की बागान मालिक मजदुरोंको उनकी मजदुरीका भुगतान करना नही चाहते थे और इस बातके परिणामोंके लिए ट्रेड यु‍िनयन यां सरकारका सामनाभी नही करना चाहते थे ।

2008 तथा 2009 में चायकी किमते बढने के बाद निवेशकर्ताओंकी चायमे दिलचस्पी बढने लगी । 7 जुलाई 2009 को स्थानिक ट्रेड युनियन और चिंचुला, मॅरिको चाय बागानके नये मालिकोंके बीच जलपाईगुडी जिल्हा मॅजिस्ट्रेट के सामने करार हुआ ।

बंद किये गये बागानोंके तथा निकाले गये मजदुरोंके लिए यह जैसे अंधेरी सुरंगके एक छोरपर उजली किरनका दिखना था । लेकिन इस नयी स्थितीकी असलियत विपरीत थी, और जैसे की चिंचुला चाय बागानके मामलेमें सामने आया है , मालिक मजदुरोंकी स्थितीका फायदा उठानेके लिए तैयार है । इस बातको हम नये करारनामेके अन्य तपशीलोंसे परख सकते है ।

नौकरीकी हमीका नष्ट होना

इस करारनामेकी धारा (1) मालिकोंको “जरुरतके अनुसार मजदुरोंको बढानेका ” हक देती है । इस बात का गंभीर असर तुरंत नही दिखेगा क्युंकी यह मौसम प्लकिंग (पौधे उखाडनेका) का तेज मौसम है । इसलिए जुलाई – अगस्तमे सभी मजदुरोंको कामपर रखा गया । असलमे व्यवस्थापनने ‘ रिप्लेसमेंट वर्कर्स ‘ को स्थायी मजदुरोंके रुपमे रखनेकी बजाय अस्थायी मजदुर के रुपमे रखा है । (रिप्लेसमेंट वर्कर्स उन्हे कहा जाता है जो निवृत्त यां मरे हुए मजदुरोंके परिवारसे नियुक्त किये जाते है। अभीतक रिप्लेसमेंट मजदुरोंको स्थायी मजदुरकाही स्थान दिया जाता था ।)

कलम (1) आगे कहता है, ” 100 % विस्तार के लिए जिल्हा प्रशासन व्यवस्थापनको राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार हमी योजना (NREGS) जैसे विकास कार्यक्रमोंके जरीये मजदुरोंको नौकरी दिलानेकी व्यवस्था करेगा । “*

इससे यह जाहीर होता है की यह करार कितने मजदुर चायका काम करेंगे इस बातको तय करनेकी मालिकोंको ना सिर्फ सहुलते देता है बल्कि व्यवस्थापनको इस बात के लिए भी अश्वस्त करता है की जब मालिक कामगारोंको काम न देनेका फैसला करेगा तब उनकी मजदुरीका अनुदान स्थानिक प्रशासन करेगा । राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार हमी योजना उन खेती कामगारोंको रोजगार दिलाने के लिए बनायी गयी है जो बेरोजगार है, मालिकोंको अपनी मर्जी के अनुसार कामगारोंको मजदुरीका भुगतान करने यां ना करनेकी सहुलत देने के लिए यह योजना नही बनी है । यह कलम कामगारोंको पुरी तरहसे मालिककी इच्छापर निर्भर रखता है , वो भी बिना किसी रोजगारकी सुर‍‍‍क्षितता और अन्य हमी के । करारनामेके कलम (9) के अनुसार ” किसीभी विभागमे मजदुरोंको काम देना पुरी तरह जरुरतपर निर्भर रहेगा ” ।

मजदुरोंके 35 % पिछली मजदुरी तथा 50 % अन्य देय रकमोंका नुकसान

करारका कलम (3) कहता है ,
” सभी मजदुरोंको कुल कानूनन देय रकमोंमेसे भविष्य निर्वाह निधी तथा ग्रॅच्युटीकी रकमकी छोडकर, 65 % रकमका भुगतान दो किश्तोंमे किया जायेगा – 1) 50 % रकम दुर्गापुजा समारोह के पहले (सितंबर 2009) दी जायेगी । 2) बाकीकी 50 % होली के पहले (मार्च 2010) पहले दी जायेगी । यह भुगतान 30 नवंबर 2005 के पहलेके देय रकमोंका पुरा और अंतिम ( Full and Final) भुगतान होगा । ”

इससे यही लगता है की मजदुरोंको उनके न दिये गये वेतन और अन्य सहुलतोंका 35 प्रतिशत हिस्सा छोडना पडेगा । गये चार सालतक न दिये गये इन कानूनन देय रकमोंका भुगतान करते समय चलन बढोत्रीको ध्यानमे रखते हुए कोई व्यवस्था नही की गयी थी । चलन बढोत्रीके बराबरीकी व्यवस्था न होनेके कारण गये पाँच सालोंके न दिये गये वेतनके 65 प्रतिशतका जो भुगतान व्यवस्थापनने किया है वो वास्तवमे मात्र 50 प्रतिशतके मूल्यकाही रहा । और बहुतही बुरे हालातोंमे रह रहे मजदुरोंकी करीब 66 प्रतिशत कानूनन देय रकमोंका नुकसान हुआ है ।

न दिये गये निवृत्ती वेतन , घरकी तथा स्वास्थ्यकी सुविधाका कुछ विवरण नही

करारके कलम (4) अनुसार भविष्य निर्वाह निधी (निवृत्ती वेतन) का भुगतान तभी होगा जब मालिकको इस बात के लिए केंद्र सरकारका अनुदान प्राप्त होगा । लेकिन यहां समयकी कोई स्पष्टता यां तारीखकी निश्चिती नही कि गयी है ।

कामगारोंके बहुतही बुरी अवस्थामे रहे मकानोंकी मरम्मत एवं चाय बागानपर उचित स्वास्थ्यसेवाकी व्यवस्था इन बातोंके बारेमे करारनामेमे संदिग्धता है और मालिकोंको इन बातोंमे कुछ भी न करनेकी (जैसा की वो चाहते है ) छूट देता है ।

किसका करार ?

इस करारके पहले चिंचुलाके कामगारोंको उनके बागानके बारेमे क्या प्लॅन्स है इसकी जो जानकारी मिली थी वो बहुतही कम, बिलकुल न के बराबर थी । नये मालिक और ट्रेड युनियन्सने करारनामेके बारेमे मजदुरोंको जानकारी दिये बगैरही करारनामेपर दस्तखत कर दिये । चिंचुला बागानके मजदुरोंको करारनामेपर ना कभी उनका मत पुछा गया ना लोकतांत्रिक तरीकेसे उनसे सलाह मशवरा करके उन्हे उनके नजरियेको निश्चित करने तथा इस प्रक्रियामे शामील होने दिया ।

जिल्हा मॅजिस्ट्रेटने FAWLOI और एक साल चालू रखनेकी बात की वचनबद्धता जतायी । (FAWLOI लॉकआउट इंडस्ट्रीके कामगारोंके पारिवारिक सहाय्य – जिसके तहत कामगारोंको प्रतिमाह एक हजार रुपये (US$ 21) मिलते है ।) ले किन यह वचनबद्धता करारनामेमे लिखी नही है । पिछले अनुभवोंके अनुसार जैसेही किसी बागानके फिरसे खोले जानेकी बात जाहीर की जाती है FAWLOI को तुरंत रोक दिया जाता है । सबसे ज्यादा तानेकी बात शायद यह होगी की जबभी किसी कामगारको यह एक हजार रुपये प्राप्त होते है वो चाय बागानमे काम करनेवाले कामगारोंके मासिक वेतनसे कई ज्यादा होते है

मालिकोंनें ‍बागान विकासके कामोंको (“uprooting” – अनुत्पादक पौधे उखाडना, “re-plantation” – उनकी जगहपर नये पौधे लगाना, “fresh plantation” – नयी जगहपर नये पौधे लगाना) हरसाल करनेकी वचनबद्धता जतायी है , जो की चायबागानोंको निर्वाहयोग्य बनाये रखने के लिए जरुरी है । बागानविकासके कामोंमे पूँजी लगानेमे मालिक वर्ग लंबे अरसेतक नाकामयाब रहा और चाय संकटकी समस्या का इतना बुरा हाल इतने समयतक चालू रहनेकी यह एक वजह है ।

अनिश्चित भविष्य

इस करारनामेपर दस्तखत होने के बाद चिंचुलाके कामगारोंको अलग अलग जगहोंसे इसके कुछ मुद्दे समझ रहे है, लेकिन ना तो स्थानिक प्रशासन, ना बागान मालिक और ना ही युनियन्सने उन्हे इस पुरे करारनामेकी जानकारी देना जरुरी समझा है । करार अंग्रेजीमे हुआ और चिंचुलाके बहुतसे कामगारोंको अंग्रेजी आती नही ।

कामगारोंको करारनामेमे क्या लिखा है यह भी मालुम नही । ज्यादातर कामगारोंको इस बातकी कल्पनाभी नही है की व्यवस्थापन बागानके सभी कामगारोंको काम देनेके लिए वचनबद्ध नही है । ज्यादातर कामगार अभी भी यही मानते है की नये मालिकोंकी व्यवस्थापनमे सभी 100 प्रतिशत कामगारोंको बागानमे काम मिलेगा ।

कामगारोंको सिर्फ इतनाही बताया गया की बागानको फिरसे खोलने और ठिकसे चलाने के लिए उन्हे उनकी कानूनन देय रकमोंके कुछ हिस्सेका त्याग करना पडेगा ।

अन्य जगहोंकी तरह चिंचुलाके कामगारोंकोभी अगर ज्यादा आमदनी मिलती हो तो चाहिए है ‍लेकिन वे उनके स्थायी नौकरीकी जगह सार्वजनिक रोजगार योजना नही चाहते । वे चाहते है की उनके चाय बागान फिरसे खुल जाये लेकिन उनकी नौकरियाँ भी सलामत रहे ।

स्थानिक ट्रेड युनियन नेताओंने, जिल्हा प्रशासनने एवं नये मालिकोंने चिंचुलाके कामगारोंको केवल मौखिक आश्वासन दिया है की सभी 100 प्रतिशत कामगारोंको उनकी नौकरी मिलेगी । कामगारोंने इस बातपर भरोसा रखकर ट्रेड युनियन लीडर्स एवं जिल्हा प्रशासनपर विश्वास जताया ।

चिंचुलाके कामगार गये पाँच सालोंमे अत्यंत दुरवस्थामे रह रहे थे जिसमे नौकरीकी कोई हमी नही थी और ना ही उनके जिंदगीको कोई स्थिरता थी । फिरभी उनसे चूप रहकर आदेशोंका पालन किये जानेकी सख्ती बरती जा रही है ।

इस तरहका किसी बागानके फिरसे खुलनेका यह पहला ही करारनामा है । औरभी ऐसे करार होंगे और अगर समझोतौंका यही मॉडेल आगे भी जारी रहा तो भारतके चाय बागान कामगारोंका संकट कभी खत्म नही होगा ।

* NREGS (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार हमी योजना) यह भारत सरकारद्वारा चलाया जानेवाला सार्वजनिक रोजगार कार्यक्रम है जिसके तहत ग्रामीण परीवारोंको हर साल, हर परीवारको 100 दिनका काम दिया जाता है ।

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